जीवामृत बनाने की सही विधि: देसी तकनीक से फसलों की पैदावार कैसे बढ़ाएँ

Darshnik R P
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देश के कई राज्यों में रासायनिक उर्वरकों की लागत बढ़ने और मिट्टी की सेहत गिरने के बीच किसान फिर से देसी इनपुट्स की ओर लौट रहे हैं। इसी संदर्भ में जीवामृत एक बार फिर चर्चा में है। कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विभागों की हालिया सलाह के अनुसार, सही विधि से तैयार किया गया जीवामृत मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को सक्रिय करता है और फसल की जड़ प्रणाली को मजबूत बनाता है। लेकिन गलत अनुपात या समय पर उपयोग न करने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। आज जरूरत है प्रक्रिया को ठीक से समझने और खेत की वास्तविक जरूरत के अनुसार इसे अपनाने की।

                                                    
खेत में जीवामृत का उपयोग करते भारतीय किसान, जैविक खेती की देसी तकनीक

जीवामृत क्या है और क्यों जरूरी है

जीवामृत एक तरल जैविक खाद है, जो देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार होती है। इसका उद्देश्य पौधों को सीधे पोषक तत्व देना नहीं, बल्कि मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या और सक्रियता बढ़ाना है।

  • यह मिट्टी की जैविक गतिविधि को तेज करता है

  • रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करता है

  • लंबे समय में मिट्टी की संरचना सुधारता है

कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि जीवामृत का असर तभी दिखता है जब इसे नियमित और सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए।


जीवामृत बनाने की सही सामग्री

जीवामृत की गुणवत्ता उसकी सामग्री पर निर्भर करती है। निम्न सामग्री का उपयोग मानक माना जाता है:

  • देसी गाय का ताजा गोबर: 10 किलो

  • देसी गाय का गोमूत्र: 5–10 लीटर

  • गुड़: 2 किलो

  • बेसन या चना आटा: 2 किलो

  • खेत की मेड़ की मिट्टी: 1 मुट्ठी

  • पानी: 200 लीटर

ध्यान रखें कि देसी गाय का उपयोग सर्वोत्तम माना गया है क्योंकि उसके गोबर और मूत्र में सूक्ष्मजीवों की विविधता अधिक होती है।


जीवामृत बनाने की चरणबद्ध विधि

जीवामृत तैयार करना जटिल नहीं है, लेकिन कुछ बुनियादी नियमों का पालन जरूरी है।

  1. एक प्लास्टिक या सीमेंट के ड्रम में 200 लीटर पानी भरें

  2. उसमें गोबर और गोमूत्र अच्छी तरह घोलें

  3. अब गुड़ और बेसन मिलाएं

  4. अंत में मेड़ की मिट्टी डालें

  5. लकड़ी की छड़ी से घड़ी की दिशा और उलटी दिशा में दिन में दो बार मिलाएं

इस मिश्रण को छाया में 48 घंटे तक रखें। तीसरे दिन जीवामृत उपयोग के लिए तैयार हो जाता है।


जीवामृत का सही समय और तरीका

कई किसान यहीं चूक कर देते हैं। जीवामृत का उपयोग सही समय पर करना उतना ही जरूरी है जितना इसे बनाना।

  • मिट्टी में डालना: बुवाई से पहले या सिंचाई के पानी के साथ

  • खड़ी फसल में: 200 लीटर जीवामृत प्रति एकड़ सिंचाई के साथ

  • बारिश के बाद: मिट्टी में नमी होने पर सबसे प्रभावी

तेज धूप में या सूखी मिट्टी पर जीवामृत डालने से बचना चाहिए।


किन फसलों में अधिक लाभ देखा गया है

मैदानी अनुभव और कृषि विभागों की रिपोर्ट के अनुसार, जीवामृत का असर कई फसलों में स्पष्ट देखा गया है:

  • धान और गेहूं: जड़ विकास बेहतर

  • दलहन और तिलहन: फूल और फल सेटिंग में सुधार

  • सब्जियां: पौधों की बढ़वार संतुलित

  • गन्ना: मिट्टी की कठोरता में कमी

यह ध्यान रखना जरूरी है कि जीवामृत कोई त्वरित समाधान नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है जिसका असर समय के साथ दिखता है।


आम गलतियां जिनसे बचना चाहिए

जीवामृत को लेकर कुछ भ्रांतियां अब भी प्रचलित हैं।

  • ज्यादा मात्रा में डालने से उत्पादन दोगुना हो जाएगा

  • किसी भी गाय का गोबर समान परिणाम देगा

  • एक बार डालने से पूरे मौसम काम चल जाएगा

विशेषज्ञ स्पष्ट कहते हैं कि ये धारणाएं गलत हैं। संतुलन, निरंतरता और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रयोग ही सही रास्ता है।


रासायनिक खेती से जैविक संक्रमण का व्यावहारिक तरीका

पूरी तरह जैविक खेती में जाना हर किसान के लिए तुरंत संभव नहीं होता। ऐसे में जीवामृत को संक्रमण उपकरण की तरह देखा जा रहा है।

  • पहले वर्ष रासायनिक खाद की मात्रा घटाएं

  • साथ में जीवामृत का नियमित उपयोग करें

  • मिट्टी परीक्षण के आधार पर निर्णय लें

यह रणनीति जोखिम को कम करती है और किसान को व्यावहारिक लाभ देती है।


निष्कर्ष

जीवामृत कोई नया आविष्कार नहीं, बल्कि भारतीय खेती की पारंपरिक समझ का आधुनिक उपयोग है। आज जब लागत, मिट्टी की सेहत और टिकाऊ उत्पादन तीनों सवालों के केंद्र में हैं, तब जीवामृत एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में सामने आता है। लेकिन इसका लाभ तभी मिलेगा जब इसे सही विधि, सही समय और सही अपेक्षाओं के साथ अपनाया जाए। खेती में स्थिरता शॉर्टकट से नहीं, बल्कि अनुशासित तरीकों से आती है—और जीवामृत उसी दिशा में एक ठोस कदम है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

1. जीवामृत कितने दिन तक उपयोग योग्य रहता है?
जीवामृत को तैयार करने के बाद 3 से 7 दिनों के भीतर उपयोग करना सबसे अच्छा माना जाता है। अधिक समय तक रखने पर उसमें सूक्ष्मजीवों की सक्रियता घटने लगती है।

2. क्या बिना देसी गाय के भी जीवामृत बनाया जा सकता है?
तकनीकी रूप से बनाया जा सकता है, लेकिन कृषि विशेषज्ञ देसी गाय के गोबर और गोमूत्र की सलाह देते हैं क्योंकि इनमें लाभकारी सूक्ष्मजीवों की विविधता अधिक होती है।

3. जीवामृत कितनी मात्रा में प्रति एकड़ डालना चाहिए?
आमतौर पर 200 लीटर जीवामृत प्रति एकड़ सिंचाई के पानी के साथ दिया जाता है। फसल और मिट्टी की स्थिति के अनुसार मात्रा में हल्का बदलाव किया जा सकता है।

4. क्या जीवामृत रासायनिक खाद का पूरा विकल्प है?
नहीं। जीवामृत मिट्टी की जैविक गतिविधि बढ़ाता है। रासायनिक खाद की मात्रा घटाने में यह सहायक है, लेकिन अचानक पूरी तरह विकल्प मानना व्यावहारिक नहीं है।

5. क्या जीवामृत का उपयोग सभी फसलों में किया जा सकता है?
हाँ, अधिकांश अनाज, दलहन, तिलहन और सब्जी फसलों में इसका उपयोग किया जा सकता है, बशर्ते सही समय और सही विधि का पालन किया जाए।

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